कल रात
जलते अलाव के एक ओर
मैं था
दूसरी ओर
वो दोनों
सफ़ेद फर और काली चित्ती वाले
जो आदमी की संगत से इतना दूर थे
कि कोई नाम नहीं मिला था उन्हें
इतने पास थे कि
'आवारा कुत्ते' कह कर दुत्कार दिए जाते थे
घंटों हम तीनों अलाव तापते रहे
वो आपस में खिलवाड़ करते रहे
मैं गुनगुनेपन और धुएं के बीच
गुनगुनापन चुनता रहा
और सोचता रहा
जो समाजवाद लेनिन माओ नहीं ला ...
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