हे प्रभु !!!
मुझे याद है
मैंने तुझसे 'खुशी' मांगी थी तूने 'जीवन' दे दिया
मैंने तुझसे माँगा था 'प्रेम' पर तूने कुछ 'समझौते वाले रिश्ते' दे दिए
मैंने तुझसे मांगी थी 'स्वतंत्रता' तूने 'बासी विकल्पों वाला पुराना मेनू' रख दिया
मैंने तुझसे कुछ 'अर्थ ' मांगे तुमने कुछ चलताऊ से 'शब्द ' थमा दिए
मैंने 'सत्य' चाहा था तूने 'धर्म की किताब' पकड़ा दी
प्रभु !!मैं तुमसे अब कुछ और नहीं चाहता
मैंने तो तुम्हारे खिलाफ 'आमरण अनशन' पर जाना चाहता हूँ
पर मैं जानता हूँ कि तेरे गुर्गे मेरे आस-पास घूम रहे हैं
जबरदस्ती मेरे मुह में अन्न के टुकडे और जहन में उम्मीद डाल कर जिलाए रखेंगे ....
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