Tuesday, October 4, 2011

अचानक वो मुझसे गले लग जाती है...






कभी-कभी 
दौड़ कर 
अचानक वो मुझसे गले लग जाती है   
या डूब जाती हैं मेरी बांहों के बीच 
जैसे कुएं में डूब जाती हो बाल्टी बिना प्रतिरोध के 
फिर ना मालूम कौन सी बात पर   
शायद पीछे से आने वाली उसके 'नाम' की संभावित पुकार पर 
या किसी देवता के विरुद्ध अपराधबोध से सिहर कर 
या बूढ़े बाप की शक्ल याद कर जो उसके लिए ढूंढ कर लता है रोज कुछ रिश्ते 
पर झटके से जैसे कोई खींच लेता हो रस्सी पागलों की तरह 
अध-भरी ,अस्त-व्यस्त निकल आती है वो बाहर
मैं उस हरे पानी की तरह 
काई लगी दीवारों के बीच अटका 
छप-छप करता असमान की ओर ताका  करता हूँ 
बाल्टी के पहले भी और बाल्टी के बाद भी .....

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