मालूम नहीं वो चींटियाँ
सोशलिस्ट थी या कैपिटलिस्ट
मैंने तो उन्हें गुड के कण कण को
अपनी पीठ पर ढोते देखा है
बिना हड़ताल, बिना नागा
'कैपिटल' बनाते हुए फाके के दिनों के लिएसोशलिस्ट थी या कैपिटलिस्ट
मैंने तो उन्हें गुड के कण कण को
अपनी पीठ पर ढोते देखा है
बिना हड़ताल, बिना नागा
और देखा है सोशलिस्टों की तरह
मिल बाँट कर खाते हुए एक साथ
फाके के दिनों में.
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