Tuesday, October 4, 2011

वो चींटियाँ


मालूम नहीं वो चींटियाँ
सोशलिस्ट थी या कैपिटलिस्ट
मैंने तो उन्हें गुड के कण कण को
अपनी पीठ पर ढोते देखा है
बिना हड़ताल, बिना नागा 
'कैपिटल' बनाते हुए फाके के दिनों के लिए
और देखा है सोशलिस्टों की तरह
मिल बाँट कर खाते हुए एक साथ
फाके के दिनों में.

"आजाद कश्मीर " की नहीं "आबाद कश्मीर" की ज़रूरत है ..


सोचने की ज़रूरत है सच में
सोचने की ज़रूरत है 
इसलिए नहीं की गिलानी चीखता है
इसलिए नहीं की अरुंधती रोती है
पर इसलिए वो कश्मीरी बच्चा अब नहीं मुस्कुराता  
पर इसलिए की वो अल्ल्हड़ लड़कियाँ कई दिनों से नहीं निकली हैं घर से किसी अनजाने डर से
पर इसलिए टूटे मंदिर का पुजारी कई सालो दिखा नहीं 
पर इसलिए की जली मस्जिद के मौलाना की अजान में अब वो बात नहीं 
सच में सोचने की ज़रूरत है कि
उन शैतानी भूल चुके बच्चों , उन सहमी लड़कियों , उस मौलाना , और पंडित को
"आजाद कश्मीर " की नहीं "आबाद कश्मीर" की ज़रूरत है ...

बैसाखी नहीं , मुझे चुनौतियाँ दो


I recited this poem at 'Akshaya Pratisthan' a NGO working for Disabled Children Education on occasion of World Disability Day.
मुझे अकेले चलने दो 
मुझे लड़ कर अपने रस्ते बनाने दो 
अगर गिरूँ 
तो खुद ही सम्हाल कर उठ खड़े होने दो 
सहारा नहीं , मुझे हौसला दो 
बैसाखी नहीं , मुझे चुनौतियाँ दो 
सहानभूति वाला कोई हाँथ नहीं 
दे सकते हो तो मुझे आत्म-सम्मान से गले मिल सकने वाली दोस्ती दो 
मैं रास्ते पर पसरी को हथेली नहीं 
जिसे तुम कुछ सिक्के थमाओ और आगे बढ़ जाओ 
न ही  मैं किसी चैरिटी की रसीद हूँ 
जिसे दस्तखत कर के भुलाया जा चुका है 
मैं बैसाखी पर चलती 
परन्तु उस दो पैरों वाली दुनिया को शर्मसार करती अंतहीन संकल्प शक्ति हूँ 
मैं बिन बाँह 
परन्तु उसी गर्मजोशी के साथ  दुनिया से  हाथ मिलाती निष्कंप इच्छाशक्ति हूँ 
मैं बिन शब्दों के अपनी बात कहती 
"क्रिकेट मैच में भारत की जीत "पर उतनी ही ऊर्जा के साथ 
विजय घोष करती अदम्य जीवनी शक्ति हूँ 
मैं बिन आँखों के सपने सजोती
और उन्हें पूरा करने के लिए  जमीनी सच्चाईयों की महीन सुइयों में विश्वास का अटूट धागा पिरोती 
वो ' शक्ति ' हूँ 
जिसकी माप शारीर के आधे या पूरे होने से नहीं 
जिसकी माप दिमाग के आधे या पूरे होने से नहीं 
इन दोनों से अलग 
एक रहस्यमयी सी ताकत से होती है 
जो संघर्ष का आधार है 
जो जूझने की प्रेरणा है 
जो सबमें मौजूद है 
पर मुझे विश्वास है कि मुझेमें और मेरे जैसों में वो कई गुनाओं में ज्यादा है 
मैं जनता हूँ 
लड़ाई हथियारों से नहीं हिम्मतों से जीती जाती है 
युद्ध सेनाओं की संख्या से नहीं जूनून से जीते जाते हैं ,,, 

दिल्ली की सर्दी....


कल रात
जलते अलाव के एक ओर 
मैं था 
दूसरी ओर 
वो दोनों 
सफ़ेद फर और काली चित्ती वाले  
जो आदमी की संगत  से इतना दूर थे 
कि कोई नाम नहीं मिला था उन्हें 
इतने पास थे कि 
'आवारा कुत्ते'  कह कर दुत्कार दिए जाते थे 
घंटों हम तीनों अलाव तापते रहे 
वो आपस में खिलवाड़ करते रहे 
मैं गुनगुनेपन  और धुएं के बीच 
गुनगुनापन चुनता रहा 
और सोचता रहा 
जो समाजवाद लेनिन माओ नहीं ला ...

प्रभु !!! मैं तो तुम्हारे खिलाफ आमरण अनशन पर जाना चाहता हूँ ....


हे प्रभु !!!
मुझे याद है 
मैंने तुझसे 'खुशी' मांगी थी तूने 'जीवन' दे दिया 
मैंने तुझसे माँगा था  'प्रेम' पर तूने  कुछ 'समझौते वाले रिश्ते' दे दिए
मैंने तुझसे मांगी थी  'स्वतंत्रता' तूने 'बासी विकल्पों वाला पुराना मेनू' रख दिया 
मैंने तुझसे  कुछ 'अर्थ ' मांगे तुमने कुछ चलताऊ से 'शब्द ' थमा दिए 
मैंने 'सत्य' चाहा था तूने 'धर्म की किताब' पकड़ा दी 
प्रभु !!मैं तुमसे अब कुछ और नहीं चाहता 
मैंने तो तुम्हारे खिलाफ 'आमरण अनशन' पर जाना चाहता हूँ
पर मैं जानता हूँ कि तेरे गुर्गे मेरे आस-पास घूम रहे हैं 
जबरदस्ती मेरे मुह में अन्न के टुकडे  और जहन में उम्मीद डाल कर जिलाए रखेंगे ....

अचानक वो मुझसे गले लग जाती है...






कभी-कभी 
दौड़ कर 
अचानक वो मुझसे गले लग जाती है   
या डूब जाती हैं मेरी बांहों के बीच 
जैसे कुएं में डूब जाती हो बाल्टी बिना प्रतिरोध के 
फिर ना मालूम कौन सी बात पर   
शायद पीछे से आने वाली उसके 'नाम' की संभावित पुकार पर 
या किसी देवता के विरुद्ध अपराधबोध से सिहर कर 
या बूढ़े बाप की शक्ल याद कर जो उसके लिए ढूंढ कर लता है रोज कुछ रिश्ते 
पर झटके से जैसे कोई खींच लेता हो रस्सी पागलों की तरह 
अध-भरी ,अस्त-व्यस्त निकल आती है वो बाहर
मैं उस हरे पानी की तरह 
काई लगी दीवारों के बीच अटका 
छप-छप करता असमान की ओर ताका  करता हूँ 
बाल्टी के पहले भी और बाल्टी के बाद भी .....