I recited this poem at 'Akshaya Pratisthan' a NGO working for Disabled Children Education on occasion of World Disability Day.
मुझे अकेले चलने दो
मुझे लड़ कर अपने रस्ते बनाने दो
अगर गिरूँ
तो खुद ही सम्हाल कर उठ खड़े होने दो
सहारा नहीं , मुझे हौसला दो
बैसाखी नहीं , मुझे चुनौतियाँ दो
सहानभूति वाला कोई हाँथ नहीं
दे सकते हो तो मुझे आत्म-सम्मान से गले मिल सकने वाली दोस्ती दो
मैं रास्ते पर पसरी को हथेली नहीं
जिसे तुम कुछ सिक्के थमाओ और आगे बढ़ जाओ
न ही मैं किसी चैरिटी की रसीद हूँ
जिसे दस्तखत कर के भुलाया जा चुका है
मैं बैसाखी पर चलती
परन्तु उस दो पैरों वाली दुनिया को शर्मसार करती अंतहीन संकल्प शक्ति हूँ
मैं बिन बाँह
परन्तु उसी गर्मजोशी के साथ दुनिया से हाथ मिलाती निष्कंप इच्छाशक्ति हूँ
मैं बिन शब्दों के अपनी बात कहती
"क्रिकेट मैच में भारत की जीत "पर उतनी ही ऊर्जा के साथ
विजय घोष करती अदम्य जीवनी शक्ति हूँ
मैं बिन आँखों के सपने सजोती
और उन्हें पूरा करने के लिए जमीनी सच्चाईयों की महीन सुइयों में विश्वास का अटूट धागा पिरोती
वो ' शक्ति ' हूँ
जिसकी माप शारीर के आधे या पूरे होने से नहीं
जिसकी माप दिमाग के आधे या पूरे होने से नहीं
इन दोनों से अलग
एक रहस्यमयी सी ताकत से होती है
जो संघर्ष का आधार है
जो जूझने की प्रेरणा है
जो सबमें मौजूद है
पर मुझे विश्वास है कि मुझेमें और मेरे जैसों में वो कई गुनाओं में ज्यादा है
मैं जनता हूँ
लड़ाई हथियारों से नहीं हिम्मतों से जीती जाती है
युद्ध सेनाओं की संख्या से नहीं जूनून से जीते जाते हैं ,,,
No comments:
Post a Comment